दलाली और कमीशनखोरी के सहारे हो रहे अनुसूचित जनजातियों के सपने साकार
आयुक्त के निर्देश बेअसर, छात्रावास-आश्रम शालाओं में खरीदी गई बिस्तर सामग्री में भारी धांधली
विभाग में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार रोकने की गई शिकायत पर नही हुई अभी तक कार्यवाही
गुना। जनजातीय कार्य विभाग अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान, शिक्षा, और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए जिम्मेदार एक सरकारी विभाग है। यह विभाग आवासीय विद्यालयों, छात्रवृत्ति और विशेष योजनाओं (जैसे वन अधिकार कानून) के माध्यम से जनजातीय समुदायों के विकास के लिए कार्य करता है। मध्यप्रदेश में यह विभाग मुख्य रूप से अनुसूचित जनजाति की आबादी को मुख्यधारा से जोडऩे के लिए केंद्र और राज्य सरकार के माध्यम से विभिन्न योजनाओं का समन्वय करता है।
दरअसल विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय आबादी के लिए पीएम जनमन कार्यक्रम चलाया है। इसके बावजूद भी जिले में संचालित जनजातीय कार्य विभाग के जिला संयोजक बी.सिसोदिया नित्य नई भ्रष्टाचार की कहानी गढ़ते जा रहे हैं। आयुक्त के सख्त निर्देश के बावजूद भी छात्रावास-आश्रम शालाओं में खरीदी गई गुणवत्ताहीन बिस्तर सामग्री थोपी जाकर अधीक्षकों से भुगतान हेतु चेक प्राप्त कर भारी धांधली की गई है। उक्त खरीदी के बिल व्हाउचरों की भी जांच होना जनहित में नितांत आवश्यक है। चूकि मप्र भंडार क्रय एवं सेवा उपार्जन नियम का बिल्कुल भी पालन नही किया गया। इसके अलावा स्थानांतरण प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई है जिसमें ट्रांसफर किए गए शिक्षकों गादेर से रामस्वरूप शिवहरे, श्रीमती फूल कुमारी खेरीखता, आरोन से पी.सी. करोलिया को सांठगांठ कर यथावत काम कराया जा रहा है। वहीं एक शिक्षक बालक आश्रम ऊमरी में मौखिक आदेश पर अधीक्षक बनाए रखा है। जबकि मंगलसिंह शर्मा को कार्य मुक्त होने के बावजूद भी संस्था पर नही भेजा जाना उदाहरण हैं।
निर्माण कार्य की राशि में कमीशनखोरी
वहीं दूसरी ओर नियम विरूद्ध प्राथमिक शिक्षक को जिला स्तरीय कन्या छात्रावास गुना का अधीक्षक नियुक्त कर दो-दो छात्रावास सौंपकर उपकृत किया गया है। इसी प्रकार मनमाफिक तरीके से हित साधकर गुना, बमोरी, कुंभराज में एक-एक प्राथमिक शिक्षकों को दो-दो जगह का तीन छात्रावासों का प्रभार दिया गया है। जिसमें भी खास बात ये है कि वरिष्ठ कार्यालय या कलेक्टर का अनुमोदन/स्वीकृति नही ली गई है। सूत्र बताते हैं कि गरीब बस्तियों में होने वाले निर्माण कार्य की राशि में कमीशनखोरी के आधार पर ही लिस्ट भेजी गई है। जिन लोगों ने दलालों के माध्यम से राशि को हरी झण्डी दी है उसी पंचायत का नाम शामिल कर वरिष्ठ कार्यालय को भेजा गया है।
शासन के दिशा-निर्देशों का उड़ाया जा रहा मखौल
सूत्रों के मुताबिक एक और सरकार की महत्वपूर्ण योजना आदि कर्मयोगी अभियान में भी भारी अनियमितताएं और घपले किए गए हैं। कुल मिलाकर डीओ ट्रायवल श्री सिसोदिया शासन की मंशानुसार विभाग न चलाकर अपनी मनमर्जी से चला रहे हैं और शासन के दिशा-निर्देशों का मखौल उड़ाया जा रहा है। इस तरह दलाली और कमीशनखोरी के सहारे अनुसूचित जनजाति वर्ग के सपने साकार हो रहे हैं यह जांच का विषय है। विभाग में भारी भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं को रोकने सूक्ष्मता से जांच कर प्रभावी कार्यवाही करने वरिष्ठ कार्यालय को भेजी गई शिकायतें भी अभी लंबित पड़ी हुई हैं। जिनकी अगर बारीकी से जांच की गई तो दमोह और झाबुआ की तरह ही गुना में बड़ा घोटाला खुलने की आशंका है।
24 जनवरी 26 को जनजातीय कार्य विभाग झाबुआ के 4 अफसरों पर एफआईआर
जनजातीय कार्य विभाग झाबुआ में भी वर्ष 2013-14 से 2019-20 के बीच छात्रावासों व शालाओं के लिए की गई सामग्री खरीदी में करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार किया गया। ईओडब्ल्यू इंदौर ने जांच के बाद 2 करोड़ 98 लाख 41 हजार 738 रूपए की सरकारी राशि के दुरूपयोग को जांच में प्रमाणित माना। इसी आधार पर 4 तत्कालीन अफसरों सहायक आयुक्त प्रशांत आर्य, सहायक परियोजना प्रशासक भारतसिंह, भंडार शाखा प्रभारी अयूब खान और बजट शाखा प्रभारी राघवेन्द्र सिसोदिया के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
दमोह जिले में प्रभारी जिला संयोजक डिप्टी कलेक्टर ब्रजेश सिंह को किया निलंबित
गत माह दिसम्बर 25 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले में आदिवासी छात्रावासों के लिए की गई 45 लाख रुपये की खरीदी में बड़े घोटाले के आरोप सामने आने के बाद डिप्टी कलेक्टर ब्रजेश सिंह को निलंबित कर दिया गया है। संभाग आयुक्त अनिल सुचारी ने यह कार्रवाई दमोह कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर की जांच रिपोर्ट और उसमें की गई अनुशंसाओं के आधार पर की। अप्रैल 2025 में आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित 32 छात्रावासों के लिए सामग्री खरीदी गई थी। उस समय ब्रजेश सिंह विभाग के प्रभारी जिला संयोजक थे। जांच में पाया गया कि खरीदी गई सामग्री की गुणवत्ता अत्यंत खराब थी और मप्र भंडार क्रय एवं सेवा उपार्जन नियम 2015 (संशोधित 2022) के नियम 17/4 का पालन नहीं किया गया। सामग्री की गुणवत्ता से संबंधित अनिवार्य जानकारी सात दिनों के भीतर ई-मेल या ई-पोर्टल पर भेजना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

