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Home»संपादकीय»चुनौतियाँ नहीं, चालान पर चलती मोहन की पुलिस?
संपादकीय

चुनौतियाँ नहीं, चालान पर चलती मोहन की पुलिस?

Hemraj JatavBy Hemraj JatavJanuary 31, 2026No Comments4 Mins Read
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प्रदेश की तस्वीर इन दिनों किसी पुराने फटे पोस्टर जैसी हो गई है जिस पर रंग भी है, नारे भी हैं, पर असल कहानी पीछे से झाँक रही बदहाली की है। एक तरफ़ प्रदेश भर में अपराध का ग्राफ ऊपर की ओर दौड़ रहा है, थानों में पीड़ितों के आवेदन धूल फाँक रहे हैं, लोग न्याय की आस में चौखटें घिस रहे हैं, और दूसरी तरफ़ पुलिस का सारा उत्साह सड़कों पर हेलमेट और सीट बेल्ट की तलाश में दौड़ता नज़र आ रहा है। सवाल सीधा है क्या कानून व्यवस्था अब चालान से चलेगी?

अदालतें बार-बार पुलिस को फटकार लगा रही हैं। जांच में लापरवाही, एफआईआर दर्ज न करने की शिकायतें, पीड़ितों को टहलाने की पुरानी बीमारी सब कुछ रिकॉर्ड पर है। लेकिन सरकार के कानों पर जूँ नहीं रेंगती। लगता है जैसे अदालतें बोल रही हों और सरकार किसी और ही चैन पर ट्यून हो। उस चैन पर जहाँ च्च्राजस्व लक्ष्यज्ज् की आवाज़ साफ़ सुनाई देती है, और च्च्पीड़ित की पुकारज्ज् सिग्नल से बाहर है।

मोहन सरकार में कानून व्यवस्था की हालत ऐसी है कि थाने न्याय के केंद्र कम, फाइलों के गोदाम ज़्यादा लगने लगे हैं। आवेदन आते हैं, रजिस्टर में दर्ज होते हैं, फिर वहीं जम जाते हैं। पीड़ित रोज़ चक्कर काटता है आज साहब मीटिंग में हैं, कल जांच अधिकारी छुट्टी पर हैं, परसों सिस्टम डाउन है। मगर सड़क पर वही पुलिस पूरी मुस्तैदी से खड़ी मिलती है हेलमेट का स्ट्रैप ढीला है, सीट बेल्ट ठीक से नहीं लगी, चालान कटेगा। अपराधी पकड़ना चुनौती है, पर चालान काटना टारगेट है।

मैं इस समय प्रदेश के दौरे पर हूँ। राजधानी भोपाल की बात छोड़ भी दें तो छोटे शहरों और कस्बों में हाल और बुरा है। बड़े शहरों में पुलिस थानों से ज़्यादा सड़कों पर दिखती है। ऐसा लगता है जैसे थानों का काम अब सड़कों पर शिफ्ट हो गया हो। वजह भी सबको पता है रसीद कट्टे की खनक। कहते हैं खून लग जाए तो उतरता नहीं; यहाँ तो रसीद कट्टे का च्च्राजस्वी खूनज्ज् लग गया है, जो हर चौराहे पर चमकता दिखता है।

यहाँ सवाल हेलमेट या सीट बेल्ट का नहीं है। यातायात नियम ज़रूरी हैं, जान बचाने के लिए हैं। पर जब नियमों का पालन सिर्फ़ वसूली के औज़ार में बदल जाए, तब आपत्ति स्वाभाविक है। जब थाने में बलात्कार, धोखाधड़ी, ज़मीन कब्ज़े, मारपीट की शिकायतें दबा दी जाएँ और सड़क पर हर दो मिनट में चालान कटे तो संदेश साफ़ जाता है कि प्राथमिकताएँ उलटी हैं।

कानून व्यवस्था सरकार की रीढ़ होती है। वही रीढ़ अगर चालान की छड़ी पर टिक जाए तो शासन झुक जाता है। जनता पूछ रही है क्या अपराध नियंत्रण अब द्वितीयक काम है? क्या पीड़ित की सुनवाई से ज़्यादा ज़रूरी है मासिक राजस्व लक्ष्य? क्या पुलिस का मूल्यांकन अब एफआईआर से नहीं, रसीदों की गिनती से होगा?

ऐसे में सच यही हैं कि अब मोहन को कल्कि अवतार लेना ही होगा वरना भ्रष्टाचार का यह काल सोने को भी मिट्टी कर देगा। व्यवस्था का क्षरण इतना गहरा हो गया है कि अगर अभी नहीं संभला, तो जनता फिर उसी पुलिसिया गुलामी में जकड़ दी जाएगी, जहाँ न्याय याचना बनकर रह जाता है और अधिकार चालान में बदल जाते हैं।

सरकार को समझना होगा पुलिस का काम सड़कों पर डर पैदा करना नहीं, अपराधियों के मन में डर पैदा करना है। थानों में बैठा पीड़ित अगर निराश होकर लौटता है, तो सड़क पर कटे हज़ार चालान भी कानून व्यवस्था की नाकामी नहीं छिपा सकते। आज ज़रूरत है प्राथमिकताओं को पलटने की रसीद कट्टे से नज़र हटाकर, न्याय की फाइल खोलने की।

क्योंकि इतिहास गवाह है जब राज्य चालान से चलता है और न्याय से नहीं, तब जनता सवाल पूछती है। और सवालों की गूंज अगर सड़कों पर फैल गई, तो फिर न हेलमेट काम आएगा, न सीट बेल्ट ?

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Hemraj Jatav

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