नैनीताल। नीम करोली बाबा भारत के उन महान संतों में से एक हैं, जिनके जीवन और चमत्कारों से जुड़ी अनेक कहानियां आज भी भक्तों के बीच सुनाई जाती हैं। उनके भक्त उन्हें प्रेम से महाराज जी कहते थे। बाबा का पूरा जीवन साधना, सेवा, भक्ति और मानव कल्याण को समर्पित रहा है। यही वजह है कि आज भी लाखों लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं। बीते दिनों फिल्म ‘हनुमान अंश’ को देखने के बाद लोगों में नीम करोली बाबा के विषय में जानने की उत्सुकता और भी बढ़ गई है। तो चलिए हम आपको नीम करोली बाबा के चमत्कारों और उनके जीवन के बारे में विस्तार से बताते हैं। इसका जिक्र बाबा के कैंची धाम की ऑफीशियल साइट पर भी मिलता है।
कौन थे नीम करोली बाबा?
नीम करोली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के अकबरपुर गांव में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण था। किशोरावस्था में ही उन्होंने परिवार की संपत्ति और सुख-सुविधाओं को छोड़ दिया था और आध्यात्मिक मार्ग पर निकल पड़े थे।
कहा जाता है कि वे गुजरात के मौरवी के पास बबानियां गांव पहुंचे। यहां उन्होंने एक वैष्णव संत से करीब 6-7 साल तक साधना सीखी। इस दौरान वे लंबे समय तक तालाब में गर्दन तक पानी में डूबे खड़े रहते और साधना करते रहते। इसी कारण उन्हें ‘तलैय्या बाबा’ के नाम से भी जाना जाने लगा।
हनुमान जी से था विशेष संबंध
बाबा नीम करोली को हनुमान जी का बहुत बड़ा भक्त माना जाता है। उन्होंने बबानियां गांव में तालाब के किनारे हनुमान जी की मूर्ति स्थापित करी थी। आगे चलकर वहां मंदिर बनवा दिया गया था।
बाबा के जीवन में हनुमान भक्ति का विशेष स्थान रहा। बाबा में हनुमान जी की भक्ति और सेवा भाव इतना गहरा था कि उनके भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश मानने लगे थे । इसी वजह से उन्हें कलयुग में ‘हनुमान अंश’ कहकर भी श्रद्धा से याद किया जाता है।
कैसे पड़ा ‘नीम करौली बाबा’ नाम?
करीब 1916 के आसपास बाबा ने बबानियां छोड़ दिया और उत्तर भारत के नीब करौरी नामक गांव पहुंचे। यह गांव आगे चलकर उनकी पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया।
इसी गांव से जुड़ा एक प्रसिद्ध रेल प्रसंग भी बाबा की चमत्कारी कथाओं में शामिल है। इस घटना के बाद नीब करौरी गांव का नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हुआ और बाबा लक्ष्मणदास को लोग ‘नीब करौरी बाबा’ कहने लगे। समय के साथ यही नाम ‘नीम करौली बाबा’ में बदल गया।
नीब करौली पहुंचने का मार्ग
नीम करौली बाबा का सबसे प्रसिद्ध और मुख्य कैंची धाम आश्रम उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली के पास स्थित है। यह नैनीताल-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर भवाली से लगभग 9 किलोमीटर और नैनीताल से करीब 17 किलोमीटर दूर स्थित है।
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